Manglashtak(Arth Sahit)मंगलाष्टक (अर्थ सहित )

Manglashtak(Arth Sahit)

मङ्गलाष्टकम्

श्रीमन्नम्र-सुरासुरेन्द्र-मुकुट-प्रद्योत-रत्नप्रभा
भास्वत्पाद-नखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः।
ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधवः
स्तुत्या योगिजनैश्च पञ्च गुरवः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥1॥

अर्थ:अणिमादि अनेक ऋद्धियों से युक्त तथा नमन करते हुए सुरेन्द्रों और असुरेन्द्रों के मुकुटों में लगे हुए कान्तियुक्त रत्नों की प्रभा से जिनके चरणों के नखरूपी चन्द्र भासमान हो रहे हैं, जो प्रवचनरूपी समुद्र को वृद्धिंगत करने के लिए चन्द्रमा के समान हैं, जो सदा अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं और जिनकी योगीजन स्तुति करते हैं, वे अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु पाँचों परमेष्ठी तुम्हारा मंगल करें ॥1॥

सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं रत्नत्रयं पावनं
मुक्ति-श्री-नगराधिनाथ-जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः।
धर्मः सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालयं श्रयालयं
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥2॥

अर्थ: निर्दोष सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र यह पवित्र रत्नत्रय है। श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के स्वामी भगवान् जिनदेव ने इसे शाश्वत सुख (मुक्ति) को देनेवाला धर्म कहा है। इस प्रकार जो यह तीन प्रकार का धर्म कहा गया है, वह तथा इसके साथ सूक्तिसुधा, समस्त जिन-प्रतिमा और लक्ष्मी का आकारभूत जिनालय मिलकर चार प्रकार का धर्म कहा गया है, वह तुम्हारा मंगल करे ॥2॥

नाभेयादि-जिनाधिपास्त्रिभुवन-ख्याताश्चतुर्विंशतिः
श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश।
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लाङ्गलधराः सप्तोत्तरा विंशतिः
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥3॥

अर्थ: तीन लोक में विख्यात जो नाभेय आदि चौबीस तीर्थंकर हुए हैं, अनेक प्रकार की विभूति से युक्त जो भरत आदि बारह चक्रवर्ती हुए हैं और जो सत्ताईस नारायण, प्रतिनारायण और बलभद्र हुए हैं, वे तीनों कालों में प्रसिद्ध त्रेसठ महापुरुष तुम्हारा मंगल करें ॥3॥

[ देव्योऽष्टौ च जयादिका द्विगुणिता विद्यादिका देवताः
श्रीतीर्थङ्करमातृकाश्च जनका यक्षाश्च यक्ष्यस्तथा।
द्वात्रिंशत् त्रिदशाधिपास्तिथिसुरा दिक्कन्यकाश्चाष्टधा
दिक्पाला दश चेत्यमी सुरगणाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥4॥]

अर्थ: [जयादिक आठ देवियाँ, सोलह विद्यादेवता, चौबीस तीर्थंकरों की माताएँ और पिता तथा उनके चौबीस यक्ष और चौबीस यक्षियाँ, बत्तीस इन्द्र, तिथिदेवता, आठ दिक्कन्याएँ और दस दिक्पाल ये सब देवगण तुम्हारा मंगल करें ॥4॥]

ये सर्वौषधऋद्धयः सुतपसो वृद्धिंगताः पञ्च ये
ये चाष्टाङ्ग-महानिमित्त-कुशला येऽष्टौ विधाश्चारणाः।
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो ये बुद्धिऋद्धीश्वराः
सप्तैते सकलार्चिता गणभृतः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥5॥

अर्थ: जो उत्तम तप से वृद्धि को प्राप्त हुई पाँच सर्वौषधि ऋद्धियों के स्वामी हैं, अष्टांग महानिमित्तों में कुशल हैं, आठ चारण-ऋद्धियों के धारी हैं, पाँच प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न हैं, तीन प्रकार के बल से युक्त हैं और बुद्धि आदि सात प्रकार की ऋद्धियों के अधिपति हैं वे जगत्पूज्य गणधरदेव तुम्हारा मंगल करे ॥5॥

कैलासे वृषभस्य निर्वृतिमही वीरस्य पावापुरे
चम्पायां वसुपूज्यसज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽर्हताम् ।
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतो
निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥6॥

अर्थ: ऋषभ जिन की कैलाश, वीर जिन की पावापुर, वासुपूज्य की चम्पा, नेमीनाथ की ऊर्जयन्त(गिरनार पर्वत) और शेष जिनों की सम्मेदशिखर निर्वाण-भूमियाँ हैं। वे विभवसम्पन्न निर्वाण-भूमियाँ तुम्हारा मंगल करें ॥6॥

ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरगृहे मेरौ कुलाद्रौ तथा
जम्बू-शाल्मलि-चैत्यशाखिषु तथा वक्षार-रूप्याद्रिषु।
इष्वाकारगिरौ च कुण्डलनगे द्वीपे च नन्दीश्वरे
शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥7॥

अर्थ: ज्योतिषी, व्यन्तर, भवनवासी और वैमानिकों के निवासस्थान में तथा मेरु, कुलाचल, जम्बूवृक्ष, शाल्मलीवृक्ष, चैत्यवृक्ष, वक्षारगिरि, विजयार्धगिरि, इष्वाकारगिरि कुण्डलनग, नन्दीश्वरद्वीप और मानुषोत्तर पर्वत पर स्थित जिन-चैत्यालय तुम्हारा मंगल करें॥7॥

यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो
यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक् ।
यः कैवल्यपुरप्रवेशमहिमा सम्भावितः स्वर्गिभिः ।
कल्याणानि च तानि पञ्च सततं कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥8॥

अर्थ: देवों ने समस्त तीर्थंकरों के जो गर्भावतार-महोत्सव, जन्माभिषेक-उत्सव, परिनिष्क्रमण-उत्सव, केवलज्ञान-महोत्सव और निर्वाण-महोत्सव किये, वे पाँचों कल्याणक तुम्हारा निरन्तर मंगल करें ॥8॥

इत्थं श्रीजिनमङ्गलाष्टकमिदं सौभाग्य-सम्पत्प्रदं
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थङ्कराणामुषः।
ये शृण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैर्धर्मार्थकामान्विता
लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥9॥

अर्थ: इस प्रकार तीर्थंकरों के पाँच कल्याणक-महोत्सवों के समय तथा प्रातःकाल जो बुद्धिमान् हर्षपूर्वक सौभाग्य और सम्पत्ति को देनेवाले इस जिन-मंगलाष्टक को सुनते हैं और पढ़ते हैं, वे सज्जन पुरुष धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों से युक्त लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं और अन्त में अपायरहित (अविनाशी) मोक्ष-लक्ष्मी को भी प्राप्त करते हैं ॥9॥

इति मङ्गलाष्टकम्

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