जैन दर्शन में देव दर्शन करना एक महत्वपूर्ण है क्रिया है। इस जैन स्तोत्र Jain Stotra- Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र Jain stotra in Hindi.  Jain Stavan Lyrics -को पढ़कर दर्शन करने चाहिए।

Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र -Jain Stavan Lyrics

Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र -Jain Stavan Lyrics

।। दृष्टाष्टक-स्तोत्रम् ।।

– श्री सकलचंद्र कृतं

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भव-ताप-हारि
भव्यात्मनां विभव-सम्भव-भूरि-हेतु।
दुग्धाब्धि-फेन-धवलोज्ज्वल-कूटकोटी
नद्ध-ध्वज-प्रकर-राजि-विराजमानम् ॥1॥

आज मैंने ऐसे जिनालय के दर्शन किये जो भव्य जीवों के ताप को हरने वाला हैं,जो अपरिमित विभव की उत्पत्ति का हेतु हैं और जो दूध तथा समुद्रफेन के समान धवलोज्ज्वल शिखर के कँगूरों में लगे हुए ध्वजसमूह-पंक्ति से शोभायमान हैं ।।1।।

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भुवनैकलक्ष्मी
धामर्द्धि-वर्धित-महामुनि-सेव्यमानम्।
विद्याधरामर-वधूजन-मुक्तदिव्य
पुष्पाञ्जलि-प्रकर-शोभित-भूमिभागम् ॥2॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो तीन लोक की लक्ष्मी का एक आश्रय है, जो ऋद्धि सम्पन्न महा मुनियों से सेव्यमान है और जहाँ की भूमि विद्याधरों और देवों की वधूजनों के द्वारा बिखेरी गयी दिव्य पुष्पांजलि के कारण शोभायमान हो रही है ॥2॥

Drastashtak Jain Stotra with meaningदृष्टाष्टक-स्तोत्रम्

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवनादिवास
विख्यात-नाक-गणिका-गण-गीयमानम।
नानामणि-प्रचय-भासुर-रश्मिजाल
व्यालीढ-निर्मल-विशाल-गवाक्ष-जालम् ॥3॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ पर भवनवासी आदि देवों की गणिकाएँ गान कर रही हैं और जिसके विशाल गवाक्षजाल (झरोखे) नाना प्रकार के मणियों की देदीप्यमान कान्ति से चित्र-विचित्र (चितकबरे) हो रहे हैं ॥3॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं सुर-सिद्ध-यक्ष
गन्धर्व-किन्नर-करार्पित-वेणु-वीणा।
संगीत-मिश्रित-नमस्कृत-धीरनादै
रापूरिताम्बर-तलोरु-दिगन्तरालम् ॥4॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ का आकाशतल और विशाल दिगन्तराल देव, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व और किन्नरों के द्वारा हाथ में वेणु निर्मित वीणा लेकर नमस्कार करते समय किये गये संगीतनाद से आपूरित हो रहा है ॥4॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं विलसद्-विलोल
मालाकुलालि-ललितालक-विभ्रमाणम्।
माधुर्य-वाद्य-लय-नृत्य-विलासिनीनां
लीला-चलद्-वलय-नूपुर-नाद-रम्यम् ॥5॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो हिलती हुई सुन्दर मालाओं में आकुल हुए भ्रमरों के कारण ललित अलकों की शोभा को धारण कर रहा है और जो मधुर शब्दयुक्त वाद्य और लय के साथ नृत्य करती हुई वारांगनाओं की लीला से हिलते हुए वलय और नूपुर के नाद से रमणीय प्रतीत होता है ॥5॥

Drastashtak Jain Stotra with meaning– मुनि सकलचंद्र जी कृत

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं मणि-रत्न-हेम-
सारोज्ज्वलैः कलश-चामर-दर्पणाद्यैः।
सन्मङ्गलैः सततमष्टशत-प्रभेदैर्
विभ्राजितं विमल-मौक्तिक-दामशोभम् ॥6॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो मणि, रत्न और स्वर्ण से निर्मित एक सौ आठ प्रकार के कलश, चामर और दर्पण आदि समीचीन मंगल द्रव्यों से सुशोभित हो रहा है और जो निर्मल मौक्तिक मालाओं से सुशोभित है ॥6॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं वरदेवदारु
कर्पूर-चन्दन-तुरुष्क-सुगन्धिधूपैः।
मेघायमानगगनं पवनाभिघात
चञ्चच्चलद्-विमल-केतन-तुङ्ग-शालम् ॥7॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ का उत्तुंग शाल, उत्तम प्रकार के देवदारु, कपूर, चन्दन और तुरुष्क (लोबान) आदि सुगन्धित द्रव्यों से बने हुए सुगन्धित धूप से निकले हुए धूम्र के कारण मानों आकाश में मेघ ही छाये हो, इस प्रकार की विचित्र शोभा को लिये हुए पवन के अभिघात से हिलती हुई पताकाओं से युक्त हो रहा है ॥7॥


दृष्टं जिनेन्द्रभवनं धवलातपत्र- –
च्छाया-निमग्न-तनु-यक्षकुमार-वृन्दैः।
दोधूयमान-सित-चामर-पंक्तिभासं
भामण्डल-द्युतियुत-प्रतिमाभिरामम् ॥8॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो श्वेत छत्र की छाया में लीन हुए यक्षकुमारों के कारण ढुरते हुए शुक्ल चामरों की पंक्ति की शोभा को धारण करता है और जो भामण्डल की द्युति से युक्त प्रतिमाओं के कारण अत्यन्त अभिराम लग रहा है ॥8॥

Jain stotra in Hindi

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं विविधप्रकार
पुष्पोपहार-रमणीय-सुरत्नभूमिम्।
नित्यं वसन्ततिलकश्रियमादधानं
सन्मङ्गलं सकल-चन्द्रमुनीन्द्र- वन्द्यं॥९ ॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ की सुन्दर रत्नभूमि नाना प्रकार के पुष्पों के उपहार के कारण रमणीय लग रही है, जो निरन्तर वसन्त ऋतु में तिलक वृक्ष की शोभा को धारण करता है, जो सर्वोत्तम मंगलरूप है और जो सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान सुखकर मुनिराजों अथवा सकलचन्द्र नामक मुनिराज के द्वारा वन्दनीय है ॥9॥

दृष्टं मयाद्य मणि-काञ्चन-चित्र-तुंग
सिंहासनादि-जिनबिम्ब-विभूतियुक्तम्।
चैत्यालयं यदतुलं परिकीर्तितं मे
सन्मङ्गलं सकल-चन्द्रमुनीन्द्र-वन्द्यं ॥१०॥

आज मैंने ऐसे जिनचैत्यालय के दर्शन किये जो मणि और स्वर्ण के कारण विचित्र शोभा को लिये हुए उत्तुंग सिंहासन आदि विभूति से युक्त जिनबिम्ब से शोभायमान हो रहा है, जिसकी निरुपम कीर्ति गायी जाती है, जो मेरे लिए मंगलस्वरूप है और जो सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान सुखकर मुनिराजों अथवा सकलचन्द्र नामक मुनिराज के द्वारा वन्दनीय है ॥10॥

( जैन स्तोत्र Drastashtak Jain Stotra with meaning )

॥ इति दृष्टाष्टकम्॥

श्री पारसनाथ स्तोत्र हिन्दी में अवश्य पढ़े !

जैन दर्शन में देव दर्शन करना एक महत्वपूर्ण है क्रिया है। इस जैन स्तोत्र Jain Stotra- Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र Jain stotra in Hindi.  Jain Stavan Lyrics -को पढ़कर दर्शन करने चाहिए।

Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र -Jain Stavan Lyrics

Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र -Jain Stavan Lyrics

Drastashtak Jain Stotra-द्रष्टाष्टक जैन स्तोत्र

।। दृष्टाष्टक-स्तोत्रम् ।।

– श्री सकलचंद्र कृतं

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भव-ताप-हारि
भव्यात्मनां विभव-सम्भव-भूरि-हेतु।
दुग्धाब्धि-फेन-धवलोज्ज्वल-कूटकोटी
नद्ध-ध्वज-प्रकर-राजि-विराजमानम् ॥1॥

आज मैंने ऐसे जिनालय के दर्शन किये जो भव्य जीवों के ताप को हरने वाला हैं,जो अपरिमित विभव की उत्पत्ति का हेतु हैं और जो दूध तथा समुद्रफेन के समान धवलोज्ज्वल शिखर के कँगूरों में लगे हुए ध्वजसमूह-पंक्ति से शोभायमान हैं ।।1।।

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भुवनैकलक्ष्मी
धामर्द्धि-वर्धित-महामुनि-सेव्यमानम्।
विद्याधरामर-वधूजन-मुक्तदिव्य
पुष्पाञ्जलि-प्रकर-शोभित-भूमिभागम् ॥2॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो तीन लोक की लक्ष्मी का एक आश्रय है, जो ऋद्धि सम्पन्न महा मुनियों से सेव्यमान है और जहाँ की भूमि विद्याधरों और देवों की वधूजनों के द्वारा बिखेरी गयी दिव्य पुष्पांजलि के कारण शोभायमान हो रही है ॥2॥

Drastashtak Jain Stotra with meaningदृष्टाष्टक-स्तोत्रम्

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवनादिवास
विख्यात-नाक-गणिका-गण-गीयमानम।
नानामणि-प्रचय-भासुर-रश्मिजाल
व्यालीढ-निर्मल-विशाल-गवाक्ष-जालम् ॥3॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ पर भवनवासी आदि देवों की गणिकाएँ गान कर रही हैं और जिसके विशाल गवाक्षजाल (झरोखे) नाना प्रकार के मणियों की देदीप्यमान कान्ति से चित्र-विचित्र (चितकबरे) हो रहे हैं ॥3॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं सुर-सिद्ध-यक्ष
गन्धर्व-किन्नर-करार्पित-वेणु-वीणा।
संगीत-मिश्रित-नमस्कृत-धीरनादै
रापूरिताम्बर-तलोरु-दिगन्तरालम् ॥4॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ का आकाशतल और विशाल दिगन्तराल देव, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व और किन्नरों के द्वारा हाथ में वेणु निर्मित वीणा लेकर नमस्कार करते समय किये गये संगीतनाद से आपूरित हो रहा है ॥4॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं विलसद्-विलोल
मालाकुलालि-ललितालक-विभ्रमाणम्।
माधुर्य-वाद्य-लय-नृत्य-विलासिनीनां
लीला-चलद्-वलय-नूपुर-नाद-रम्यम् ॥5॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो हिलती हुई सुन्दर मालाओं में आकुल हुए भ्रमरों के कारण ललित अलकों की शोभा को धारण कर रहा है और जो मधुर शब्दयुक्त वाद्य और लय के साथ नृत्य करती हुई वारांगनाओं की लीला से हिलते हुए वलय और नूपुर के नाद से रमणीय प्रतीत होता है ॥5॥

Drastashtak Jain Stotra with meaning– मुनि सकलचंद्र जी कृत

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं मणि-रत्न-हेम-
सारोज्ज्वलैः कलश-चामर-दर्पणाद्यैः।
सन्मङ्गलैः सततमष्टशत-प्रभेदैर्
विभ्राजितं विमल-मौक्तिक-दामशोभम् ॥6॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो मणि, रत्न और स्वर्ण से निर्मित एक सौ आठ प्रकार के कलश, चामर और दर्पण आदि समीचीन मंगल द्रव्यों से सुशोभित हो रहा है और जो निर्मल मौक्तिक मालाओं से सुशोभित है ॥6॥

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं वरदेवदारु
कर्पूर-चन्दन-तुरुष्क-सुगन्धिधूपैः।
मेघायमानगगनं पवनाभिघात
चञ्चच्चलद्-विमल-केतन-तुङ्ग-शालम् ॥7॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ का उत्तुंग शाल, उत्तम प्रकार के देवदारु, कपूर, चन्दन और तुरुष्क (लोबान) आदि सुगन्धित द्रव्यों से बने हुए सुगन्धित धूप से निकले हुए धूम्र के कारण मानों आकाश में मेघ ही छाये हो, इस प्रकार की विचित्र शोभा को लिये हुए पवन के अभिघात से हिलती हुई पताकाओं से युक्त हो रहा है ॥7॥


दृष्टं जिनेन्द्रभवनं धवलातपत्र- –
च्छाया-निमग्न-तनु-यक्षकुमार-वृन्दैः।
दोधूयमान-सित-चामर-पंक्तिभासं
भामण्डल-द्युतियुत-प्रतिमाभिरामम् ॥8॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जो श्वेत छत्र की छाया में लीन हुए यक्षकुमारों के कारण ढुरते हुए शुक्ल चामरों की पंक्ति की शोभा को धारण करता है और जो भामण्डल की द्युति से युक्त प्रतिमाओं के कारण अत्यन्त अभिराम लग रहा है ॥8॥

Jain stotra in Hindi

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं विविधप्रकार
पुष्पोपहार-रमणीय-सुरत्नभूमिम्।
नित्यं वसन्ततिलकश्रियमादधानं
सन्मङ्गलं सकल-चन्द्रमुनीन्द्र- वन्द्यं॥९ ॥

आज मैंने ऐसे जिनेन्द्रभवन के दर्शन किये जहाँ की सुन्दर रत्नभूमि नाना प्रकार के पुष्पों के उपहार के कारण रमणीय लग रही है, जो निरन्तर वसन्त ऋतु में तिलक वृक्ष की शोभा को धारण करता है, जो सर्वोत्तम मंगलरूप है और जो सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान सुखकर मुनिराजों अथवा सकलचन्द्र नामक मुनिराज के द्वारा वन्दनीय है ॥9॥

दृष्टं मयाद्य मणि-काञ्चन-चित्र-तुंग
सिंहासनादि-जिनबिम्ब-विभूतियुक्तम्।
चैत्यालयं यदतुलं परिकीर्तितं मे
सन्मङ्गलं सकल-चन्द्रमुनीन्द्र-वन्द्यं ॥१०॥

आज मैंने ऐसे जिनचैत्यालय के दर्शन किये जो मणि और स्वर्ण के कारण विचित्र शोभा को लिये हुए उत्तुंग सिंहासन आदि विभूति से युक्त जिनबिम्ब से शोभायमान हो रहा है, जिसकी निरुपम कीर्ति गायी जाती है, जो मेरे लिए मंगलस्वरूप है और जो सम्पूर्ण चन्द्रमा के समान सुखकर मुनिराजों अथवा सकलचन्द्र नामक मुनिराज के द्वारा वन्दनीय है ॥10॥

( जैन स्तोत्र Drastashtak Jain Stotra with meaning )

॥ इति दृष्टाष्टकम्॥

श्री पारसनाथ स्तोत्र हिन्दी में अवश्य पढ़े !