हनुमान जी से सीखे झुक के रहना 

निरअहंकारिता यदि सीखनी है तो पूरी दुनिया के रोल मॉडल है हमारे हनुमान जी !

हनुमान जी से सीखे झुक के रहना
हनुमान जी से सीखे झुक के रहना

उनसे बड़ा निरहंकारी ढूँढना बड़ा मुश्किल है और उन्होंने ऐसे ऐसे काण्ड किये है (यहाँ पर आप पूछेंगे कि आपने इस लेख में काण्ड शब्द का इस्तेमाल क्यों किया ? मैं आपको बताते चलूँ कि (काण्ड एक अच्छा शब्द है क्योकि रामायण

में भी अयोध्या काण्ड,लंका काण्ड,सुन्दर काण्ड सारे काण्ड शब्द ही उपयोग में लाया गया है ) !

ये उस वक्त की बात है जब हनुमान जी अपनी शक्ति भूल चुके थे हनुमान जी को अपनी शक्ति भूलने का श्राप मतंग ऋषि ने दिया था और कहा जब तुझे याद दिलाया जाएगा तब याद आ जायेगी तो जब सीता जी को खोजने जाना था तब हनुमान जी शक्ति भूल गए तब जामवन्त जी ने याद दिलाई तब हनुमान जी जामवन्त जी से पूछ रहे है कि मुझे अब क्या करना है ? यहाँ पर आप ये देखने और सोचने वाली बात है कि जब हनुमान जी को अपनी शक्ति याद आ गयी फिर भी वो एक बूढ़े आदमी जामवंत जी से पूछ रहे है कि मुझे क्या करना चाहिए ?

तब जामवन्त जी ने कहा कि पवनसुत तुम जा सकते हो तुम आ सकते हो तो हनुमान जी ने कहा कि ठीक है !

जिस पर्वत पर पैर रख कर हनुमान जी लंका कीऔर कूदे तो कहते है कि वो पर्वत हनुमान जी के बल से सीधे पाताल में चला गया हनुमान जी इतनी शक्ति के साथ कूदे ! रास्ते में उनका टकराव हुआ सुरषा के साथ हुआ !

निरहंकारिता सीखनी है तो यहाँ हनुमान जी से सीख सकते है ! 

सुरषा ने कहा कि मैं तुम्हे खा जाउंगी तो हनुमान जी बोले तुमको समय है मेरे पास समय नहीं है ! पहले में सीता माता से मिल आऊँ फिर बेसक खा लेना वो बोली मैं तो अभी खाऊँगी

तो हनुमान जी बोले कि फिर देर मत करो समय हमारे पास कम है !

तो फिर कहते है कि सुरषा ने अपना मुंह बढाया एक योजन का मुंह कर लिया (एक योजन में 8 मील होता है ) जैसे सुरषा ने अपना मुंह 1 योजन किया तो कहते है कि वो 2 योजन के हो गए जैसे ही फिर सुरषा ने अपना मुंह 2 योजन किया तो हनुमान जी 4 योजन के हो गए जैसे उसने अपना मुंह 4 योजन किया हनुमान जी 8 योजन के हो गए ऐसे हर बार सुरषा अपना मुंह बड़ा करती जाती और हनुमान जी हर बार अपना शरीर दोगुना कर लेते ऐसा करते करते सुरषा ने अपना मुंह जैसे ही 64योजन का किया तो हनुमान जी ने सोचा कि ऐसे बात बनने वाली नहीं है तब हनुमान जी ने अपना शरीर थोडा सा छोटा किया और सुरषा के मुंह में घुसकर एक दम से बाहर आ गए और बोले अब जाने दे ! देखो अब मैं तुम्हारे मुंह में गया तो था और अब बाहर भी आ गया हूँ!

यहाँ पर हमें एक सन्देश हनुमान जी से ये मिलता है कि जब ताकत दिखानी थी तो बड़े होते चले गए और जब बुद्धि दिखानी थी तो छोटे हो गए  !

हमेशा एक बात याद रखना कि बुद्धिमान आदमी हमेशा छोटा और नम्रशील होता है और जब भी कोई बड़ा होने का सोच ले बुद्धि से तो समझ लेना कि विपरीत बुद्धि हो गयी है उसकी !

उसके बाद जब हनुमान जी लंका पहुंचे तो सबसे पहले उनकी मुलाकात लंकिनी से हुई और लंकिनी को हनुमान जी ने घूँसा मारा और लंकिनी मुर्छित (बेहोश )हो गयी जब लंकिनी बेहोशी की हालत से उठी तो लंकिनी ने लंका का द्वार खोल दिया हनुमान जी के लिए तो हनुमान जी बोले- तू तो लंका की निवासी है तू मेरे लिए लंका के द्वार क्यों खोल रही है और वो भी इतनी आसानी से !

तो लंकिनी बोली कि ब्रह्म्मा जी ने रावण को जब वर दिया तो जाते जाते मुझे बोल दिया था कि जब बन्दर के मारने से तू मुर्छित हो जायेगी तो समझ लेना कि रावण के विनाश का समय शुरू हो गया है तो दरवाजा खोल दिया लंकिनी  ने !

फिर हनुमान जी अन्दर गए विभीषण से मिले ततपश्चात सीता जी से मिलने के लिए हनुमान जी पहुचे तो रावण धमका रहा था रावण वहीँ था तो हनुमान जी पत्तों के बीच में छुप के बैठ गए !

तो रावण सीता जी से कह रहा था कि ” एक महीने का समय है तुम्हारे पास या तो हाँ कर देना या फिर गर्दन काट दूंगा” और बार-बार धमकाते हुए रावण अपनी तलवार निकाले जिससे सीता जी डर जाये और हाँ कर दे ! अनेक पर्यत्न (प्रयास) के बाद रावण वहां से चला गया जैसे ही रावण वहां से गया !

तुरंत हनुमान जी माता सीता के पास आये और जो प्रभु श्री राम ने मुद्रिका (अंगूठी ) दी थी वो ऊपर पेड पर से सीता माता की गोद में गिरा दी तो माता सीता को ये समझ नहीं आया कि ये अंगूठी कहाँ  से आई ?

तुरंत हनुमान जी नीचे आये तो माता सीता ने पुछा कि आप कौन हो ?

तब हनुमान जी ने कहा –

रामदूत मैं मात जानकी, सत्य शपथ करुणा निधान की !

अर्थात :- मैं राम जी का दूत हूँ और ये मैं उनकी शपथ पूर्वक कहता हूँ इससे बड़ा परिचय मेरा और कोई नहीं है !

“अब सोचो अगर हमारे जैसा आदमी आज के समय में 5 या 7 अपनी ID लेकर जाता और कहता कि आप हमें नहीं जानते ! क्या आपको नहीं पता कि मैं कौन हूँ ? सुरषा मारी, लंकिनी मारी सबको मारता पीटता आया हूँ मैं ! हलके मैं मत लेना मुझे !”

लेकिन नहीं हनुमान जी कहते है कि माते मैं राम जी का दूत हूँ ये मैं प्रभु श्री राम जी कसम खा कर कहता हूँ इससे ज्यादा परिचय मेरा कुछ  नहीं है ! बस इतना ही समझो !

तो सीता जी ने कहा –

ज्यों रघुबीर होती सुधि पायी,करते नहीं विलम्ब रघुराई !!

अर्थात: प्रभु श्री राम मेरी सुधि (चिंता) करते तो इतना विलम्ब(देर) नहीं करते यहाँ पर आने में ! जल्दी आ जाते !

तो हनुमान जी को जयंत की कथा(कहानी) सुनाई-

माता सीता बोली  – जयंत (इंद्र का बेटा) था,वनवास के समय कौये का रूप बना कर आया और मेरे पैरो में चोच मार कर चला गया जब प्रभु श्री राम ने देखा कि एक कौआ चोच मार कर चला गया (भगवान् की परीक्षा लेने के लिए)  तभी श्री प्रभु ने सरगंडे (एक अस्त्र) का प्रयोग किया तो कौआ तीनो भुवन (तीनो लोक ) में चक्कर लगाता रहा उसको जब कहीं भी जगह नहीं मिली तो प्रभु श्री राम के चरणों में आ कर गिरा !

तो माँ ने कहा- जब कौआ के मेरे पैर में चोच मारने से प्रभु उस पर इतने क्रोधित हो गए थे और आज जब रावण मुझे यहाँ जबरदस्ती उठा कर ले आया और श्री प्रभु कुछ कर नहीं रहे !

तो हनुमान जी बोले – यदि आप आज्ञा दे तो मैं आपको अभी यहाँ से ले चलता हूँ ! रावण को तो मैं अभी मार के आपको ले जा सकता हूँ मगर अभी प्रभु श्री राम की आज्ञा नहीं है ! अभी आप कुछ दिन और यहाँ प्रवास करो प्रभु आयेंगे और आपको ले जायेंगे !

हनुमान जी बोले- बड़ी सेना है मेरी ही तरह उनके पास (हनुमान जी क्यूंकि माता से मिलने सूक्ष्म(छोटे आकार) में गए थे तो माता ने कहा कि तुम्हारी तरह ! तो हनुमान जी बोले – बाकी तो मुझसे भी छोटे है ! तो माँ ने कहा- फिर तो हो गया कल्याण !!

माता सीता कहती है – 

मेरे हृदय परम संदेहां, सुन कपि प्रगट किये निज देहा !! 

अर्थ:- कि मेरे ह्रदय में परम संदेह है तभी हनुमान जी ने अपनी कनक समान ( सोने जैसी कान्ति) वाली देह प्रगट करी और हनुमान जी अपना विशाल रूप दिखलाया और कहा माता प्रभु श्री राम कि सेना को हलके में आकंलन मत करो !

यहाँ पर सीख ये है कि – हनुमान जी ने डर को दूर करने के लिए अपना रूप बड़ा किया और हम डराने के लिए रूप बड़ा करते है ! 

माँ सीता बोली- कि मुझे अब भरोसा हो गया है अब अपना रूप छोटा कर लो ! तो हनुमान जी बोले तो माँ मैं अब कुछ खा लूँ !

अब ये बात तो सब जानते है कि हनुमान जी से बड़ा कोई राजनीतिज्ञ नही हुआ तो हनुमान जी कुछ फ़लों को खाने के साथ साथ वन उपवन उजाड़ने लगे और सैनिकों को मारने लगे !  यह बात जब रावण को पता चली तो रावण ने मेघनाद को भेजा ब्रह्मअस्त्र के साथ ! 

अब मेघनाद आया ब्रह्मास्त्र लेकर हनुमान जी ने सोचा कि ब्रह्मास्त्र का मान तो रखना ही है इसी कारण हनुमान जी बन्ध गए मेघनाद ले चला हनुमान जी को रावण के दरबार में !

बड़ा जबरदस्त सवांद है – 

रावण ने पुछा – कि अशोक वाटिका  क्यों उजाड़ी ?

तो हनुमान जी बोले – भूख लगी थी इसीलिए ! फिर उन्होने रावण से कहा कि रावण ! तुम्हारी बुद्धि तो ठीक ठाक है बस अपना मन ठीक कर लो ! जाओ प्रभु श्री राम के पास और उनके चरण पकड़ लो यही तुम्हे समझाता हूँ ! हमारे गुरु ने हमें सिखाया हम तुम्हे सिखा रहे है ! 

तो रावण बोला – कि अब बन्दर हमें सिखायेंगे !

 रावण ने कहा- कि तुझे पता है कि उपदेश देने का क्या  परिणाम होता है ? हनुमान जी बोले – कि हमारे यहाँ तो उपदेश देने वाले का सम्मान होता है तो रावण ने कहा कि हमारे यहाँ तो मृत्युदण्ड मिलता है ! 

तभी रावण ने मृत्यु को हनुमान जी के बगल में खड़ा कर दिया और बोला – देख मृत्यु तेरे बगल में खड़ी है !  

मगर हनुमान जी डरे नहीं ! 

और रावण से हनुमान जी बोले- कि रावण मृत्यु मेरे बगल में खडी जरुर है लेकिन देख तेरी तरफ रही है ! 

रावण बोला – खड़ी तेरे पास है और देख मुझे क्यों रही है ?

हनुमान जी बोले –  कि वो तो मुझसे पूछ रही है कि अभी रुकना है कि अभी मामला साफ़ कर दूँ ! 

रावण क्रोधित होते हुए बोला – इस बन्दर को मार डालों !

तो किसी ने हनुमान जी से पूछा- कि आपको डर नहीं लगता हाथ पैर बंधे है आपके और मृत्यु पास खडी है इतने राक्षसों के बीच में वो भी निडर ! 

हनुमान जी बोले – मुझे बाँधा गया है मेरे प्रभु को नहीं इसलिए निडर हूँ ! 

आपने सूरदास का नाम तो अवश्य सुना होगा –

सूरदास को किसी ने पूछा- सूरदास तुम तो अंधे हो फिर भी रोज़ मंदिर आ जाते हो !  क्या करने आ जाते हो रोज मंदिर में गिरते पड़ते !

सूरदास बोले – मुझे ही तो नहीं दीखता है मगर कान्हा जी तो देखते ही होंगे मुझे कि इतने भक्तों में एक अँधा भक्त भी है मेरा ! 

तो जैसे ही रावण ने कहा कि मार डालो इस बन्दर को !

इतने में ही विभीषण आ गया ! हनुमान जी मन में बोले – लो प्रभु ने भेज दिया बचाने मुझे !

विभीषण ने कहा – कि दूत को मारना तो राजधर्म के विरूद्ध है ! 

रावण ने कहा तो फिर क्या करें ? 

विभीषण बोले- पूँछ में आग लगा दो !

हनुमान जी मुस्कुराये – और सोचे कि काम बन गया ! 

जैसे ही हनुमान जी की पूँछ में आग लगायी बाद में तो आपको पता ही है कि फिर क्या हुआ !

लंका में आग लगाने के बाद वापस सीता जी के पास आये और कहा – कि माता अब मैं जा रहा हूँ कुछ निशानी दे दो 

सब कुछ करने के बाद हनुमान जी वापस आये !

राम जी पूछा- कि हनुमान ये सब काण्ड (सुरषा,लंकिनी का वध,लंका में आग लगाना,अशोक वाटिका को ध्वस्त करना) तुमने किया है ?

हनुमान जी के पास में ही जामवन्त जी बैठे थे हनुमान जी बोले जामवन्त जी से पूछों !

प्रभु ने जामवन्त जी पूछा- 

जामवन्त कहे – हनुमान जी से पूछों !

यही पूछने का क्रम 4-5 बार हो गया ! 

अब प्रभु श्री राम थोड़े से खीझ (जोर से बोलना ) कर बोले – तो क्या मैंने किया है ? 

हनुमान जी बोले – यही तो मैं कह रहा हूँ कि सब आपने किया है

सच बताओ अगर हम हनुमान जी की जगह होते तो –

हम कहते कि मैंने ये  किया मैंने वो किया वगैरह- वगैरह !अपनी शक्ति का उद्धरण और गुण गान करते घूमते ! मगर समर्पण का भाव मिलेगा श्री हनुमान जी में !

मगर सच में निरहंकारीपने  के सबसे श्रेष्ठ उद्धरण है श्री हनुमान जी ! 

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