विनयपाठ Vinaypath Jain Pooja

विनयपाठ Vinaypath Jain Pooja

— कविश्री नाथूराम

नित्य नियम पूजा-विधि

(पूजा प्रारम्भ करते समय नौ बार णमोकार-मंत्र पढ़कर नीचे लिखे विनयपाठ व मंगलपाठ बोलकर पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए।)

(दोहावली)

इह विधि ठाड़ो होयके, प्रथम पढ़े जो पाठ।

 धन्य जिनेश्वरदेव तुम, नाशे कर्म जु आठ॥१॥ 

अनंत-चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सरताज।

 मुक्ति-वधू के कंत तुम, तीन भुवन के राज॥२॥

 तिहुँ जग की पीड़ा हरन, भवदधि शोषणहार।

 ज्ञायक हो तुम विश्व के, शिवसुख के करतार॥३॥

 हरता अघ-अंधियार के, करता धर्म-प्रकाश।

 थिरता-पद दातार हो, धरता निजगुण-रास॥४॥

 धर्मामृत उर जलधि सों, ज्ञान-भानु तुम रूप। 

तुमरे चरण सरोज को, नावत तिहुँ जग-भूप॥५॥

मैं वंदौं जिनदेव को, कर अति निर्मल भाव। 

कर्मबंध के छेदने, और न कछू उपाव॥६॥ 

भविजन को भवकूपनै, तुम ही काढ़नहार। 

दीन-दयाल अनाथ-पति, आतम गुण-भंडार॥७॥

चिदानंद निर्मल कियो, धोय कर्म-रज मैल।

 सरल करी या जगत् में, भविजन को शिवगैल॥८॥

 तुम पद-पंकज-पूजतें, विघन-रोग टर जाय। 

शत्रु मित्रता को धरै, विष निरविषता थाय॥९॥

 चक्री खगधर इन्द्रपद, मिलैं आप ते आप। 

अनुक्रम करि शिवपद लहैं, नेम सकल हनि पाप॥१०॥

 तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे जल-बिन मीन।

 जन्म-जरा मेरी हरो, करो मोहि स्वाधीन॥११॥

 पतित बहुत पावन किये गिनती कौन करेव। 

अंजन से तारे प्रभु, जय जय जय जिनदेव॥१२॥ 

थकी नाव भवदधि-विषै, तुम प्रभु पार करेय।

 खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव॥१३॥

 राग-सहित जग में रुल्यो, मिले सरागी देव।

 वीतराग भेट्यो अबै, मेटो राग-कुटेव॥१४॥

 कित निगोद कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान।

आज धन्य मानुष भयो, पायो जिनवर-थान॥१५॥

 तुमको पूजै सुरपती, अहिपति नरपति देव। 

धन्य भाग्य मेरो भयो, करन लग्यो तुम सेव॥१६॥ 

अशरण के तुम शरण हो निराधार आधार।

मैं डूबत भव-सिंधु में, खेओ लगाओ पार॥१७॥

 इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान्। 

अपनो विरद निहार कै, कीजै आप समान॥१८॥

 तुमरी नेक सुदृष्टि तैं, जग उतरत है पार। 

हा हा डूब्यो जात हौं, नेक निहार निकार॥१९॥

जो मैं कहहूँ और सों, तो न मिटे उर-भार। 

मेरी तो तोसौं बनी, तातैं करौं पुकार॥२०॥

 वंदौं पाँचों परमगुरु, सुर-गुरु वंदत जास।

 विघनहरन मंगलकरन, पूरन परम प्रकाश॥२१॥

 चौबीसों जिन-पद नमौं, नमौं शारदा माय। 

शिवमग साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय॥२२॥

विनयपाठ Vinaypath Jain Pooja

मंगलपाठ

 मंगलमूर्ति परमपद, पंच धरौं नित ध्यान।

 हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान्॥१॥ 

मंगल जिनवर-पद नमौं, मंगल अर्हन्तदेव।

 मंगलकारी सिद्धपद, सो वंदौं स्वयमेव॥२॥

 मंगल आचारज-मुनि, मंगल गुरु-उवज्झाय।

 सर्व साधु मंगल करो, वंदौं मन-वच-काय॥३॥

 मंगल सरस्वती-मात का, मंगल जिनवर-धर्म।

 मंगलमय मंगल करो, हरो असाता-कर्म॥४॥ 

या विधि मंगल से सदा, जग में मंगल होत।

 मंगल ‘नाथूराम’ यह, भवसागर दृढ़-पोत॥५॥


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