दर्शन स्तुति-प्रभु पतित पावन

Darshan Stuti (Prabhu Patit Pavan Main Apavan Jain Stuti Hindi

प्रभु पतित पावन मैं अपावन, चरण आयो शरण जी |
यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरण जी |1|
तुम ना पिछान्या आन मान्या, देव विविध प्रकार जी |
या बुद्धि सेती निज न जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी |2|


भव विकट वन में करम बैरी, ज्ञानधन मेरो हरयो |
सब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय, अनिष्ट गति धरतो फिरयो |3|
धन घड़ी यो, धन दिवस यो ही, धन जनम मेरो भयो |
अब भाग्य मेरो उदय आयो, दरश प्रभु को लख लयो |4|


छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा पै धरै |
वसु प्रातिहार्य अनन्त गुण युत, कोटि रवि छवि को हरैं |5|
मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आतम भयो |
मो उर हर्ष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो |6|


मैं हाथ जोड़ नवाऊं मस्तक, वीनऊँ तुव चरणजी |
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारण तरण जी |7|
जाचूं नहीं सुर-वास पुनि, नर-राज परिजन साथ जी |
‘बुध’ जाचहुँ तुव भक्ति भव-भव, दीजिए शिवनाथ जी |8|

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