अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra

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श्री जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन करते समय श्रावकगण इसका पठन-पाठन अवश्य करे। इस अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra को पढ़ने से मन में और जीवन में असीम शांति का अनुभव होता है। श्री जैन स्तोत्रों की महान श्रृंखला….

अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra Darshan Karte Huye shravak jain mandir
अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra अर्थ सहित

अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra

अद्याष्टक-स्तोत्रम्-अर्थ सहित

[ गुणनन्दिकृतम्]

अद्य मे सफलं जन्म नेत्रे च सफले मम।
त्वामद्राक्षं यतो देव हेतुमक्षयसम्पदः ॥1॥

हे देव ! आज मैंने अक्षय सम्पत्ति के हेतुभूत आपके दर्शन किये। इससे मेरा जन्म सफल हो गया और दोनों नेत्र सफल हो गये ॥1॥

अद्य संसार-गम्भीर-पारावारः सुदुस्तरः।
सुतरोऽयं क्षणेनैव जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥2॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से तरने के लिए अत्यन्त कठिन यह गम्भीर संसाररूपी समुद्र मेरे लिए क्षणमात्र में सुतर अर्थात् सुगमता से पार करने योग्य हो गया ॥2॥

अद्य मे क्षालितं गात्रं नेत्रे च विमले कृते।
स्नातोऽहं धर्म-तीर्थेषु जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥3॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से मेरा शरीर धुल गया, नेत्र निर्मल हो गये और मैंने धर्मतीर्थों में स्नान कर लिया ॥3॥

श्री जैन अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra

अद्य मे सफलं जन्म प्रशस्तं सर्वमंगलम्।
संसारार्णव-तीर्णोऽहं जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥4॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से मेरा जन्म सफल हो गया, मुझे प्रशस्त सर्व मंगलों की प्राप्ति हो गयी और मैं संसाररूपी समुद्र से तैरकर पार हो गया ॥4॥

अद्य कर्माष्टक-ज्वालं विधूतं सकषायकम्।
दुर्गतेर्विनिवृत्तोऽहं जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥5॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से मैंने कषाय के साथ आठ कर्मों को जलाकर दूर कर दिया और मैं दुर्गति से पार हो गया ॥5॥

अद्य सौम्या ग्रहाः सर्वे शुभाश्चैकादश-स्थिताः।
नष्टानि विघ्न-जालानि जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥6॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से मेरे एकादश स्थान में स्थित सब ग्रह सौम्य और शुभ हो गये तथा विघ्नजाल नष्ट हो गये ॥6॥

दर्शन करते समय पढ़ने योग्य-अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra

अद्य नष्टो महाबन्धः कर्मणां दुःखदायकः।
सुख-सङ्गं समापन्नो जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥7॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से दुःख देनेवाला कर्मों का महाबन्ध नष्ट हो गया और मैं सुखकर संगति को प्राप्त हो गया ॥7॥

अद्य कर्माष्टकं नष्टं दुःखोत्पादन-कारकम्।
सुखाम्भोधि-निमग्नोऽहं जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥8॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से दुःख को उत्पन्न करनेवाले आठ कर्म नष्ट हो गये तथा मैं सुखसागर में निमग्न हो गया ॥8॥

अद्य मिथ्यान्धकारस्य हन्ता ज्ञान-दिवाकरः।
उदितो मच्छरीरेऽस्मिन् जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥9॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से मेरे शरीर में मिथ्यात्वरूप अन्धकार का नाश करनेवाला ज्ञानरूपी सूर्य उदित हुआ है ॥9॥

आचार्य श्री गुणनंदी जी रचित अद्याष्टक जैन स्तोत्रम्-adyashtak Jain Stotra

अद्याहं सुकृतीभूतो निर्धूताशेषकल्मषः।
भुवन-त्रय-पूज्योऽहं जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥10॥

हे जिनेन्द्र ! आज आपका दर्शन करने से समस्त पाप-मैल को धोकर मैं पुण्यशाली और तीन लोक में पूज्य हो गया ॥10॥

अद्याष्टकं पठेद्यस्तु गुणानन्दित-मानसः।
तस्य सर्वार्थसंसिद्धिर्जिनेन्द्र ! तव दर्शनात् ॥11॥

हे जिनेन्द्र ! आपका दर्शन करते समय जो आपके गुणों में आनन्दपूर्वक अपने मन को लगाकर इस अद्याष्टक स्तोत्र को पढ़ता है, उसे आपका दर्शन करने मात्र से सब अर्थों में सिद्धि या सर्वार्थसिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥11॥

॥ इत्यद्याष्टकम् ॥



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